Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.59 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.59

2.59
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् । नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ २-५९ ॥
yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham | nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā || 2-59 ||
— जो सर्वत्र स्नेहरहित है ; — जो शुभ या अशुभ पाकर ; — न अभिनन्दन करता है न द्वेष करता है ; — उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है

जो सर्वत्र स्नेहरहित होकर शुभ या अशुभ जो भी प्राप्त हो उसका न अभिनन्दन करता है न द्वेष करता है — उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित (स्थिर) है।