Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.58 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.58

2.58
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थिरधीर्मुनिरुच्यते ॥ २-५८ ॥
duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ | vītarāgabhayakrodhaḥ sthiradhīrmunirucyate || 2-58 ||
— दुःखों में उद्विग्नचित्त न होने वाला ; — सुखों में स्पृहारहित ; — राग, भय और क्रोध से रहित ; — स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है

जो दुःखों में उद्विग्नचित्त नहीं होता, सुखों में स्पृहारहित रहता है, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है — वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।