दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थिरधीर्मुनिरुच्यते ॥
२-५८ ॥
duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ |
vītarāgabhayakrodhaḥ sthiradhīrmunirucyate ||
2-58 ||
जो दुःखों में उद्विग्नचित्त नहीं होता, सुखों में स्पृहारहित रहता है, और जो राग, भय तथा क्रोध से रहित है — वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।