Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.57 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.57

2.57
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ २-५७ ॥
prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān | ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate || 2-57 ||
— जब वह कामनाओं को त्याग देता है ; — समस्त मनोगत, हे पार्थ ; — आत्मा में ही आत्मा से सन्तुष्ट ; — तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है

हे पार्थ, जब मनुष्य मन में स्थित समस्त कामनाओं को सर्वथा त्याग देता है, और आत्मा में ही आत्मा से सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।