प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
२-५७ ॥
prajahāti yadā kāmānsarvānpārtha manogatān |
ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate ||
2-57 ||
हे पार्थ, जब मनुष्य मन में स्थित समस्त कामनाओं को सर्वथा त्याग देता है, और आत्मा में ही आत्मा से सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।