यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
२-५४ ॥
yadā te mohakalilaṃ buddhirvyatitariṣyati |
tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca ||
2-54 ||
जब तुम्हारी बुद्धि मोह के सघन वन को पार कर जाएगी, तब तुम जो सुना जा चुका है और जो सुना जाना है, उन सबके प्रति वैराग्य को प्राप्त होगे।