श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥
२-५५ ॥
śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā |
samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi ||
2-55 ||
जब श्रुति के नाना मतों से व्याकुल हुई तुम्हारी बुद्धि समाधि में निश्चल और अचल होकर स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त करोगे।