Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.55 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.55

2.55
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ २-५५ ॥
śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā | samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi || 2-55 ||
— श्रुति के नाना मतों से व्याकुल तेरी ; — जब निश्चल होकर स्थिर होगी ; — समाधि में अचल बुद्धि ; — तब तू योग को प्राप्त करेगा

जब श्रुति के नाना मतों से व्याकुल हुई तुम्हारी बुद्धि समाधि में निश्चल और अचल होकर स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त करोगे।