Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.52 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.52

2.52
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ २-५२ ॥
buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte | tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam || 2-52 ||
— बुद्धियुक्त इस लोक में त्याग देता है ; — पुण्य और पाप दोनों को ; — अतः योग के लिए अपने को जोड़ ; — कर्मों में कुशलता ही योग है

बुद्धियोग से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है; अतः योग के लिए अपने को जोड़ो — कर्मों में कुशलता ही योग है।