Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.51 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.51

2.51
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ २-५१ ॥
dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanañjaya | buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ || 2-51 ||
— कहीं अधिक निम्न है सकाम कर्म ; — बुद्धियोग की तुलना में ; — हे धनञ्जय ; — बुद्धि में शरण खोज ; — फल के हेतु बनने वाले दीन हैं

हे धनञ्जय, बुद्धियोग की तुलना में सकाम कर्म कहीं अधिक निम्न है; तुम बुद्धि में शरण खोजो — फल के हेतु बनने वाले तो दीन (कृपण) हैं।