दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥
२-५१ ॥
dūreṇa hyavaraṃ karma buddhiyogāddhanañjaya |
buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ ||
2-51 ||
हे धनञ्जय, बुद्धियोग की तुलना में सकाम कर्म कहीं अधिक निम्न है; तुम बुद्धि में शरण खोजो — फल के हेतु बनने वाले तो दीन (कृपण) हैं।