Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.50 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.50

2.50
यस्य सर्वे समारम्भ निराशीर्बन्धनास्त्विह । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥ २-५० ॥
yasya sarve samārambha nirāśīrbandhanāstviha | tyāge yasya hutaṃ sarvaṃ sa tyāgī sa ca buddhimān || 2-50 ||
— जिसके समस्त आरम्भ ; — कामनाजनित बन्धन से रहित हैं ; — जिसने सब कुछ त्याग में हवन कर दिया ; — वही त्यागी और वही बुद्धिमान्

जिसके समस्त आरम्भ इस लोक में कामनाजनित बन्धन से रहित हैं, और जिसने अपना सब कुछ त्याग में हवन कर दिया है — वही सच्चा त्यागी है और वही बुद्धिमान्।