Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.49 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.49

2.49
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ २-४९ ॥
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya | siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate || 2-49 ||
— योग में स्थित होकर कर्म कर ; — आसक्ति त्यागकर, हे धनञ्जय ; — सिद्धि-असिद्धि में समान होकर ; — समता ही योग कहलाती है

हे धनञ्जय, आसक्ति को त्यागकर, योग में स्थित होकर कर्म करो, और सिद्धि-असिद्धि में समान बनो; यह समता ही योग कहलाती है।