Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.47 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.47

2.47
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ २-४७ ॥
yāvānartha udapāne sarvataḥ samplutodake | tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ || 2-47 ||
— जलाशय में जितना प्रयोजन ; — जब सब ओर जल भर जाता है ; — उतना ही समस्त वेदों में ; — ज्ञानी ब्राह्मण के लिए

जब सब ओर से जल भर जाता है तब जलाशय (कूप) का जितना प्रयोजन रह जाता है, उतना ही प्रयोजन ज्ञानी ब्राह्मण के लिए समस्त वेदों का रह जाता है।