यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
२-४७ ॥
yāvānartha udapāne sarvataḥ samplutodake |
tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ||
2-47 ||
जब सब ओर से जल भर जाता है तब जलाशय (कूप) का जितना प्रयोजन रह जाता है, उतना ही प्रयोजन ज्ञानी ब्राह्मण के लिए समस्त वेदों का रह जाता है।