Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.42 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.42

2.42
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकैव कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ २-४२ ॥
vyavasāyātmikā buddhirekaiva kurunandana | bahuśākhā hyanantāśca buddhayo'vyavasāyinām || 2-42 ||
— निश्चयात्मिका बुद्धि ; — एक ही होती है ; — हे कुरुनन्दन ; — बहुशाखाओं वाली और अनन्त ; — अनिश्चयियों की बुद्धियाँ

हे कुरुनन्दन, निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किन्तु अनिश्चयी पुरुषों की बुद्धियाँ बहुशाखाओं वाली और अनन्त होती हैं।