Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.41 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.41

2.41
नेहातिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ २-४१ ॥
nehātikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate | svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt || 2-41 ||
— इसमें आरम्भ का नाश नहीं ; — कोई विपरीत फल नहीं होता ; — इस धर्म का थोड़ा-सा भी ; — महान् भय से रक्षा करता है

इस मार्ग में आरम्भ का नाश नहीं होता, न कोई विपरीत फल होता है; इस धर्म का थोड़ा-सा भी आचरण महान् भय से रक्षा करता है।