नेहातिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
२-४१ ॥
nehātikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate |
svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||
2-41 ||
इस मार्ग में आरम्भ का नाश नहीं होता, न कोई विपरीत फल होता है; इस धर्म का थोड़ा-सा भी आचरण महान् भय से रक्षा करता है।