Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.43 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.43

2.43
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिनः ॥ २-४३ ॥
yāmimāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadantyavipaścitaḥ | vedavādaratāḥ pārtha nānyadastītivādinaḥ || 2-43 ||
— इस पुष्पित वाणी को ; — अविवेकी जन बोलते हैं ; — वेद के शब्दों में रत, हे पार्थ ; — 'इससे अधिक कुछ नहीं' ऐसा कहने वाले

हे पार्थ, अविवेकी जन, जो वेद के शब्दों में रत हैं और 'इससे अधिक कुछ नहीं' ऐसा कहते हैं, इस पुष्पित वाणी को बोलते हैं —