Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.21 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.21

17.21
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्राजसमिति स्मृतम् ॥ १७-२१ ॥
yattu pratyupakārārthaṃ phalamuddiśya vā punaḥ | dīyate ca parikliṣṭaṃ tadrājasamiti smṛtam || 17-21 ||
— किन्तु जो प्रत्युपकार के लिए ; — अथवा फिर फल को लक्ष्य करके ; — और कष्टपूर्वक दिया जाता है ; — वह राजस माना गया

किन्तु जो प्रत्युपकार के लिए, अथवा फिर फल को लक्ष्य करके, और कष्टपूर्वक दिया जाता है — वह राजस माना गया है।