Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.2 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.2

15.2
अधश्चोर्ध्वं प्रसृता यस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ १५-२ ॥
adhaścordhvaṃ prasṛtā yasya śākhā guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ | adhaśca mūlānyanusantatāni karmānubandhīni manuṣyaloke || 15-2 ||
— जिसकी शाखाएँ नीचे-ऊपर फैली हैं ; — गुणों से बढ़ी, विषय-पल्लवों वाली ; — और नीचे इसकी जड़ें फैली हैं ; — कर्मों से बाँधने वाली, मनुष्यलोक में

इसकी शाखाएँ, जो गुणों से बढ़ी हुई और विषय रूपी पल्लवों वाली हैं, नीचे और ऊपर फैली हुई हैं; और नीचे मनुष्यलोक में कर्मों से बाँधने वाली इसकी जड़ें फैली हुई हैं।