Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.3 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.3

15.3
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्त्रेण शितेन च्छित्त्वा ॥ १५-३ ॥
na rūpamasyeha tathopalabhyate nānto na cādirna ca sampratiṣṭhā | aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūla- masaṅgaśastreṇa śitena cchittvā || 15-3 ||
— इसका रूप यहाँ इस प्रकार उपलब्ध नहीं ; — न अन्त, न आदि, न प्रतिष्ठा ; — इस सुदृढ़ मूल वाले अश्वत्थ को ; — असंगति (वैराग्य) रूपी तीक्ष्ण शस्त्र से काटकर

इसका रूप यहाँ इस प्रकार उपलब्ध नहीं होता — न इसका अन्त, न आदि, और न प्रतिष्ठा (आधार); इस सुदृढ़ मूल वाले अश्वत्थ को असंगति (वैराग्य) रूपी तीक्ष्ण शस्त्र से काटकर —