Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.25 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.25

14.25
मानावमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रापरिपक्षयोः । सर्वारम्भफलत्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ १४-२५ ॥
mānāvamānayostulyastulyo mitrāparipakṣayoḥ | sarvārambhaphalatyāgī guṇātītaḥ sa ucyate || 14-25 ||
— मान-अपमान में समान ; — मित्र-शत्रुपक्ष में समान ; — समस्त आरम्भों के फल का त्यागी ; — वह गुणातीत कहलाता है

जो मान और अपमान में समान, मित्र और शत्रु-पक्ष में समान, समस्त आरम्भों के फल का त्यागी है — वह गुणातीत कहलाता है।