मानावमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रापरिपक्षयोः ।
सर्वारम्भफलत्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
१४-२५ ॥
mānāvamānayostulyastulyo mitrāparipakṣayoḥ |
sarvārambhaphalatyāgī guṇātītaḥ sa ucyate ||
14-25 ||
जो मान और अपमान में समान, मित्र और शत्रु-पक्ष में समान, समस्त आरम्भों के फल का त्यागी है — वह गुणातीत कहलाता है।