Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.24 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.24

14.24
समदुःखसुखःस्वप्नः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ १४-२४ ॥
samaduḥkhasukhaḥsvapnaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ | tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṃstutiḥ || 14-24 ||
— दुःख-सुख में समान, स्वस्थ (आत्मनिष्ठ) ; — ढेला, पत्थर, सोना समान मानने वाला ; — प्रिय-अप्रिय में समान, धीर ; — अपनी निन्दा-स्तुति में समान

जो दुःख-सुख में समान, स्वस्थ (आत्मनिष्ठ), मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान मानने वाला, प्रिय-अप्रिय में समान, धीर, और अपनी निन्दा-स्तुति में समान है;