Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.26 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.26

14.26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १४-२६ ॥
māṃ ca yo'vyabhicāreṇa bhaktiyogena sevate | sa guṇānsamatītyaitānbrahmabhūyāya kalpate || 14-26 ||
— और जो अव्यभिचारी ; — भक्तियोग से मेरी सेवा करता है ; — वह इन गुणों को भली-भाँति लाँघकर ; — ब्रह्मभाव के लिए योग्य हो जाता है

और जो अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन गुणों को भली-भाँति लाँघकर ब्रह्मभाव के लिए योग्य हो जाता है।