Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.12 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.12

14.12
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमश्च तृट् । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १४-१२ ॥
lobhaḥ pravṛttirārambhaḥ karmaṇāmaśamaśca tṛṭ | rajasyetāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha || 14-12 ||
— लोभ, प्रवृत्ति, आरम्भ ; — कर्मों का, अशान्ति और तृष्णा ; — रजस् के बढ़ने पर ये उत्पन्न होते हैं ; — हे भरतर्षभ

हे भरतर्षभ, रजस् के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और तृष्णा — ये उत्पन्न होते हैं।