सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
१२-४ ॥
sanniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva sarvabhūtahite ratāḥ ||
12-4 ||
इन्द्रिय-समूह को भली-भाँति संयत करके, सर्वत्र समबुद्धि वाले, और समस्त भूतों के हित में रत वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं।