Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.4 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.4

12.4
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ १२-४ ॥
sanniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ | te prāpnuvanti māmeva sarvabhūtahite ratāḥ || 12-4 ||
— इन्द्रिय-समूह को भली-भाँति संयत करके ; — सर्वत्र समबुद्धि वाले ; — वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं ; — समस्त भूतों के हित में रत

इन्द्रिय-समूह को भली-भाँति संयत करके, सर्वत्र समबुद्धि वाले, और समस्त भूतों के हित में रत वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं।