Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.3 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.3

12.3
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ १२-३ ॥
ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate | sarvatragamacintyaṃ ca kūṭasthamacalaṃ dhruvam || 12-3 ||
— किन्तु जो अक्षर, अनिर्देश्य ; — अव्यक्त की उपासना करते हैं ; — सर्वव्यापी और अचिन्त्य ; — कूटस्थ, अचल, ध्रुव

किन्तु जो अक्षर, अनिर्देश्य (वर्णन के अगोचर), अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं —