Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.2 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.2

12.2
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ १२-२ ॥
mayyāveśya mano ye māṃ nityayuktā upāsate | śraddhayā parayopetāste me yuktatamā matāḥ || 12-2 ||
— जो मुझमें मन आविष्ट करके मुझे ; — नित्ययुक्त होकर उपासना करते हैं ; — परम श्रद्धा से युक्त ; — वे मेरे मत में सबसे अधिक युक्त

जो मुझमें मन को आविष्ट करके, नित्ययुक्त होकर, परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सबसे अधिक युक्त (योगी) हैं।