Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.19 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.19

12.19
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १२-१९ ॥
tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yenakenacit | aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ || 12-19 ||
— निन्दा-स्तुति को समान, मौनी ; — जो भी मिले उसमें सन्तुष्ट ; — अनिकेत, स्थिरबुद्धि ; — भक्तिमान् वह मनुष्य मुझे प्रिय

जो निन्दा और स्तुति को समान मानता है, मौनी है, जो भी मिले उसमें सन्तुष्ट है, अनिकेत (आश्रय-रहित), स्थिरबुद्धि और भक्तिमान् है — वह मनुष्य मुझे प्रिय है।