ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥
१२-२० ॥
ye tu dharmyāmṛtamidaṃ yathoktaṃ paryupāsate |
śraddadhānā matparamā bhaktāste'tīva me priyāḥ ||
12-20 ||
किन्तु जो भक्त इस धर्ममय अमृत का, जैसा कहा गया है वैसा, सेवन करते हैं, श्रद्धावान् होकर और मुझे परम मानकर — वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।