Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.18 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.18

12.18
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानावमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १२-१८ ॥
samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāvamānayoḥ | śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ || 12-18 ||
— शत्रु और मित्र में समान ; — वैसे ही मान-अपमान में ; — शीत-उष्ण, सुख-दुःख में ; — समान, आसक्ति से रहित

जो शत्रु और मित्र में, तथा मान और अपमान में समान है, जो शीत-उष्ण, सुख-दुःख में समान और आसक्ति से रहित है,