कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो ल्लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
११-३३ ॥
kālo'smi lokakṣayakṛtpravṛddho llokānsamāhartumiha pravṛttaḥ |
ṛte'pi tvā na bhaviṣyanti sarve ye'vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ ||
11-33 ||
मैं काल हूँ, लोकों का क्षय करने वाला, बढ़ा हुआ, यहाँ लोकों को समेटने में प्रवृत्त; तेरे बिना भी ये सब योद्धा, जो विरोधी सेनाओं में खड़े हैं, नहीं रहेंगे।