Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.33 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.33

11.33
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो ल्लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ११-३३ ॥
kālo'smi lokakṣayakṛtpravṛddho llokānsamāhartumiha pravṛttaḥ | ṛte'pi tvā na bhaviṣyanti sarve ye'vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ || 11-33 ||
— मैं काल हूँ, लोकों का क्षयकारी, बढ़ा हुआ ; — यहाँ लोकों को समेटने में प्रवृत्त ; — तेरे बिना भी ये सब नहीं रहेंगे ; — जो योद्धा विरोधी सेनाओं में खड़े हैं

मैं काल हूँ, लोकों का क्षय करने वाला, बढ़ा हुआ, यहाँ लोकों को समेटने में प्रवृत्त; तेरे बिना भी ये सब योद्धा, जो विरोधी सेनाओं में खड़े हैं, नहीं रहेंगे।