Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.32 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.32

11.32
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ११-३२ ॥
ākhyāhi me ko bhavānugrarūpo namo'stu te devavara prasīda | vijñātumicchāmi bhavantamādyaṃ na hi prajānāmi tava pravṛttim || 11-32 ||
— मुझे बताइए, आप उग्र-रूप वाले कौन हैं ; — आपको नमस्कार हो, हे देवश्रेष्ठ, प्रसन्न होइए ; — मैं आप आद्य को जानना चाहता हूँ ; — क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं समझता

मुझे बताइए कि आप उग्र-रूप वाले कौन हैं; आपको नमस्कार हो, हे देवश्रेष्ठ, प्रसन्न होइए; मैं आप आद्य पुरुष को जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं समझता।