स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय ! जायते वर्णसङ्करः ।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ॥
१-४२ ॥
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya ! jāyate varṇasaṅkaraḥ |
saṅkaro narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya ca ||
1-42 ||
हे वार्ष्णेय, स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है; और यह संकर कुलघातियों तथा कुल — दोनों के लिए नरक का कारण बनता है।