Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.42 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.42

1.42
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय ! जायते वर्णसङ्करः । सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ॥ १-४२ ॥
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya ! jāyate varṇasaṅkaraḥ | saṅkaro narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya ca || 1-42 ||
— स्त्रियों के दूषित होने पर ; — हे वार्ष्णेय ; — वर्णसंकर उत्पन्न होता है ; — संकर नरक का ही कारण ; — कुलघातियों और कुल के लिए

हे वार्ष्णेय, स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है; और यह संकर कुलघातियों तथा कुल — दोनों के लिए नरक का कारण बनता है।