Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.43 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.43

1.43
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः । दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ॥ १-४३ ॥
patanti pitaro hyeṣāṃ luptapiṇḍodakakriyāḥ | doṣairetaiḥ kulaghnānāṃ varṇasaṅkarakārakaiḥ || 1-43 ||
— इनके पितर पतित हो जाते हैं ; — पिण्ड और जल की क्रियाओं से वञ्चित ; — इन दोषों से ; — कुलघातियों के ; — वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले

क्योंकि इन वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले कुलघातियों के दोषों से, पिण्ड और जल की क्रियाओं से वञ्चित होकर इनके पितर पतित हो जाते हैं।