Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.44 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.44

1.44
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः । उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ! ॥ १-४४ ॥
utsādyante jātidharmāḥ kuladharmāśca śāśvatāḥ | utsannakuladharmāṇāṃ manuṣyāṇāṃ janārdana ! || 1-44 ||
— जातिधर्म उच्छिन्न हो जाते हैं ; — और शाश्वत कुलधर्म ; — जिनके कुलधर्म नष्ट हो गए ; — ऐसे मनुष्यों का ; — हे जनार्दन

जातिधर्म और शाश्वत कुलधर्म उच्छिन्न हो जाते हैं; और हे जनार्दन, जिनके कुलधर्म नष्ट हो गए हों, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है — ऐसा हमने सुना है।