Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.45 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.45

1.45
अहो वत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ १-४५ ॥
aho vata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam | yadrājyasukhalobhena hantuṃ svajanamudyatāḥ || 1-45 ||
— हाय खेद है ; — बड़ा भारी पाप ; — हम करने को तत्पर हो गए हैं ; — जो राज्य-सुख के लोभ से ; — स्वजनों को मारने को उद्यत हैं

हाय! हम बड़ा भारी पाप करने को तत्पर हो गए हैं, जो राज्य-सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने को उद्यत हैं।