Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.41 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.41

1.41
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत । अधर्माभिभवात् कृष्ण ! प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ॥ १-४१ ॥
dharme naṣṭe kulaṃ kṛtsnamadharmo'bhibhavatyuta | adharmābhibhavāt kṛṣṇa ! praduṣyanti kulastriyaḥ || 1-41 ||
— धर्म के नष्ट होने पर ; — समस्त कुल को ; — अधर्म अभिभूत कर लेता है ; — अधर्म के अभिभव से ; — हे कृष्ण ; — कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं

धर्म के नष्ट होने पर समस्त कुल को अधर्म अभिभूत कर लेता है; और हे कृष्ण, अधर्म के अभिभूत हो जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं।