Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.40 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.40

1.40
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ! । कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ॥ १-४० ॥
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ! | kulakṣaye praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ || 1-40 ||
— कुलक्षय से उत्पन्न दोष को ; — भली-भाँति देखते हुए हमें ; — हे जनार्दन ; — कुल के नष्ट होने पर ; — सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं

हे जनार्दन, कुलक्षय से उत्पन्न दोष को भली-भाँति देखते हुए भी — कुल के नष्ट होने पर सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं।