Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.37 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.37

1.37
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः । तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ॥ १-३७ ॥
pāpamevāśrayedasmān hatvaitānātatāyinaḥ | tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān || 1-37 ||
— हमें पाप ही लगेगा ; — इन आततायियों को मारकर ; — अतः हम मारने योग्य नहीं ; — धृतराष्ट्रपुत्रों को, अपने ही बन्धुओं को

इन आततायियों को मारकर हमें पाप ही लगेगा; अतः अपने ही बन्धु धृतराष्ट्रपुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं।