निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ! ॥
१-३६ ॥
nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana ! ||
1-36 ||
तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या। हे जनार्दन, धृतराष्ट्रपुत्रों को मारकर हमें कौन-सा सुख होगा?