Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.31 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.31

1.31
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः । निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ! ॥ १-३१ ॥
na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ | nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava ! || 1-31 ||
— और मैं खड़ा रहने में असमर्थ हूँ ; — और मेरा मन घूमता-सा है ; — और मैं लक्षण (शकुन) देखता हूँ ; — विपरीत, अपशकुन ; — हे केशव

हे केशव, मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ, मेरा मन घूमता-सा प्रतीत होता है, और मैं विपरीत लक्षण (अपशकुन) देख रहा हूँ।