Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.32 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.32

1.32
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे । न काङ्क्षे विजयं कृष्ण ! न च राज्यं सुखानि च ॥ १-३२ ॥
na ca śreyo'nupaśyāmi hatvā svajanamāhave | na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa ! na ca rājyaṃ sukhāni ca || 1-32 ||
— और मुझे कल्याण नहीं दिखता ; — युद्ध में स्वजनों को मारकर ; — मैं विजय नहीं चाहता ; — हे कृष्ण ; — और न राज्य, न सुख

युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता; हे कृष्ण, मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य, न सुख।