मकारेण जगत्स्रष्टा प्रणवार्थ उदाहृतः ।
सच्छब्देन सदा स्थायि चिच्चैतन्यं प्रकीर्तितम् ॥३३॥
makāreṇa jagatsraṣṭā praṇavārtha udāhṛtaḥ |
sacchabdena sadā sthāyi ciccaitanyaṃ prakīrtitam ||33||
'म' कार से जगत् का स्रष्टा (ब्रह्मा) — इस प्रकार प्रणव का अर्थ कहा गया। 'सत्' शब्द से सदा स्थायी, 'चित्' से शुद्ध चैतन्य कहा गया है।