The Great Liberation Tantra· 3.33 / 153

The Great Liberation Tantra3.33

3.33
मकारेण जगत्स्रष्टा प्रणवार्थ उदाहृतः । सच्छब्देन सदा स्थायि चिच्चैतन्यं प्रकीर्तितम् ॥३३॥
makāreṇa jagatsraṣṭā praṇavārtha udāhṛtaḥ | sacchabdena sadā sthāyi ciccaitanyaṃ prakīrtitam ||33||
— 'म' कार से ; — जगत् का स्रष्टा (ब्रह्मा) ; — प्रणव का अर्थ ; — कहा गया ; — 'सत्' शब्द से ; — सदा ; — स्थायी ; — शुद्ध चैतन्य ; — कहा गया है

'म' कार से जगत् का स्रष्टा (ब्रह्मा) — इस प्रकार प्रणव का अर्थ कहा गया। 'सत्' शब्द से सदा स्थायी, 'चित्' से शुद्ध चैतन्य कहा गया है।