एकमद्वैतमीशानि वृहत्त्वाद्ब्रह्म गीयते ।
मन्त्रार्थः कथितो देवि साधकाभीष्टसिद्धिदः ॥३४॥
ekamadvaitamīśāni vṛhattvādbrahma gīyate |
mantrārthaḥ kathito devi sādhakābhīṣṭasiddhidaḥ ||34||
हे ईशानि, 'एकम्' से एक, अद्वैत, और बृहत्त्व (महानता) के कारण 'ब्रह्म' कहा जाता है। हे देवि, इस प्रकार साधक के अभीष्ट की सिद्धि देने वाला मन्त्रार्थ कहा गया।