The Great Liberation Tantra· 3.34 / 153

The Great Liberation Tantra3.34

3.34
एकमद्वैतमीशानि वृहत्त्वाद्ब्रह्म गीयते । मन्त्रार्थः कथितो देवि साधकाभीष्टसिद्धिदः ॥३४॥
ekamadvaitamīśāni vṛhattvādbrahma gīyate | mantrārthaḥ kathito devi sādhakābhīṣṭasiddhidaḥ ||34||
— एक ; — अद्वैत ; — हे ईशानि ; — बृहत्त्व (महानता) के कारण ; — ब्रह्म ; — कहा जाता है ; — मन्त्रार्थ ; — कहा गया ; — हे देवि ; — साधक के अभीष्ट की सिद्धि देने वाला

हे ईशानि, 'एकम्' से एक, अद्वैत, और बृहत्त्व (महानता) के कारण 'ब्रह्म' कहा जाता है। हे देवि, इस प्रकार साधक के अभीष्ट की सिद्धि देने वाला मन्त्रार्थ कहा गया।