The Great Liberation Tantra· 3.32 / 153

The Great Liberation Tantra3.32

3.32
अतोऽस्यार्थञ्च चैतन्यं कथयामि शृणु प्रिये । अकारेण जगत्पाता संहर्ता स्यादुकारतः ॥३२॥
ato'syārthañca caitanyaṃ kathayāmi śṛṇu priye | akāreṇa jagatpātā saṃhartā syādukārataḥ ||32||
— अतः ; — इसके अर्थ को ; — चैतन्य को ; — कहता हूँ ; — सुनो ; — हे प्रिये ; — 'अ' कार से ; — जगत् का पाता (विष्णु) ; — संहारक ; — है ; — 'उ' कार से

अतः मैं इसका अर्थ और चैतन्य कहता हूँ; हे प्रिये, सुनो। 'अ' कार से जगत् का पाता (विष्णु), 'उ' कार से संहारक (शिव),