The Great Liberation Tantra· 3.31 / 153

The Great Liberation Tantra3.31

3.31
मन्त्रार्थं मन्त्रचैतन्यं यो न जानाति साधकः । शतलक्षप्रजप्तोऽपि तस्य मन्त्रो न सिद्ध्यति ॥३१॥
mantrārthaṃ mantracaitanyaṃ yo na jānāti sādhakaḥ | śatalakṣaprajapto'pi tasya mantro na siddhyati ||31||
— मन्त्र के अर्थ को ; — मन्त्र-चैतन्य को ; — जो ; — नहीं ; — जानता ; — साधक ; — सौ लाख बार जपने पर ; — भी ; — उसका ; — मन्त्र ; — नहीं ; — सिद्ध होता

जो साधक मन्त्र के अर्थ और मन्त्र-चैतन्य को नहीं जानता, उसका मन्त्र सौ लाख बार जपने पर भी सिद्ध नहीं होता।