The Great Liberation Tantra· 3.30 / 153

The Great Liberation Tantra3.30

3.30
स तु सर्वहितः साधुः सर्वेषां प्रियकारकः । तस्यानिष्टे कृते देवि को वा स्यान्निरुपद्रवः ॥३०॥
sa tu sarvahitaḥ sādhuḥ sarveṣāṃ priyakārakaḥ | tasyāniṣṭe kṛte devi ko vā syānnirupadravaḥ ||30||
— वह ; — निश्चय ही ; — सबका हितकारी ; — साधु ; — सबके ; — प्रिय करने वाला ; — उसका अनिष्ट ; — किए जाने पर ; — हे देवि ; — कौन ; — अथवा ; — हो ; — निरुपद्रव

वह तो सबका हितकारी, साधु, सबके प्रिय करने वाला है; हे देवि, उसका अनिष्ट किए जाने पर भला कौन निरुपद्रव रह सकता है?