The Great Liberation Tantra· 1.34 / 72

The Great Liberation Tantra1.34

1.34
त्वां विना कोऽस्ति जीवानां घोरसंसारसागरे । भर्त्ता पाता समुद्धर्त्ता पितृवत् प्रियकृत् प्रभुः ॥३४॥
tvāṃ vinā ko'sti jīvānāṃ ghorasaṃsārasāgare | bharttā pātā samuddharttā pitṛvat priyakṛt prabhuḥ ||34||
— तुम्हें ; — बिना ; — कौन ; — है ; — जीवों का ; — घोर संसार-सागर में ; — भर्ता, धारण करने वाला ; — पाता, रक्षक ; — उद्धारकर्ता ; — पिता के समान ; — प्रिय करने वाला ; — प्रभु

आपके बिना घोर संसार-सागर में जीवों का भर्ता, पाता (रक्षक), उद्धारकर्ता, और पिता के समान प्रिय करने वाला प्रभु और कौन है?