The Great Liberation Tantra· 1.33 / 72

The Great Liberation Tantra1.33

1.33
तदा त्वं प्रकटीकृत्य तपः स्वाध्यायदुर्बलान् । लोकानतारयः पापात् दुःखशोकामयप्रदात् ॥३३॥
tadā tvaṃ prakaṭīkṛtya tapaḥ svādhyāyadurbalān | lokānatārayaḥ pāpāt duḥkhaśokāmayapradāt ||33||
— तब ; — तुम ; — प्रकट करके ; — तप से ; — स्वाध्याय में दुर्बलों को ; — लोकों को ; — तार दिया ; — पाप से ; — दुःख, शोक और रोग देने वाले से

तब आपने (उन्हें) प्रकट करके, तप-स्वाध्याय में दुर्बल लोगों को दुःख, शोक और रोग देने वाले पाप से तार दिया।