— मध्य-जिह्वा में, जिह्वा के मध्य में (अधिकरण — समासगत); — मुख विस्तृत खोलकर (समासगत विशेषण); — मध्य में रखकर (अधिकरण + क्त्वान्त); — चेतना को (कर्म कारक); — 'ह'-उच्चारण (कर्म कारक — समासगत); — मन से करता हुआ (करण + वर्तमान कृदन्त); — तब शान्त में (अव्यय + अधिकरण); — प्रलीन हो जाता है (कर्मवाच्य वर्तमान)
जिह्वा को मध्य में रखकर, मुख को विस्तृत खोलकर, मध्य में चेतना का निक्षेप करके, मानसिक रूप से 'ह' का उच्चारण करते हुए — (साधक) तब शान्त (परम) में प्रलीन हो जाता है। (धारणा ४६)