Vijñāna Bhairava Tantra · 1.64

Vijñāna Bhairava Tantra 1.64

1.64
मध्यजिह्वे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम् । होच्चारं मनसा कुर्वंस्ततः शान्ते प्रलीयते ॥६४॥
madhyajihve sphāritāsye madhye nikṣipya cetanām | hoccāraṃ manasā kurvaṃs tataḥ śānte pralīyate
anuṣṭubh
— मध्य-जिह्वा में, जिह्वा के मध्य में (अधिकरण — समासगत) ; — मुख विस्तृत खोलकर (समासगत विशेषण) ; — मध्य में रखकर (अधिकरण + क्त्वान्त) ; — चेतना को (कर्म कारक) ; — 'ह'-उच्चारण (कर्म कारक — समासगत) ; — मन से करता हुआ (करण + वर्तमान कृदन्त) ; — तब शान्त में (अव्यय + अधिकरण) ; — प्रलीन हो जाता है (कर्मवाच्य वर्तमान)

जिह्वा को मध्य में रखकर, मुख को विस्तृत खोलकर, मध्य में चेतना का निक्षेप करके, मानसिक रूप से 'ह' का उच्चारण करते हुए — (साधक) तब शान्त (परम) में प्रलीन हो जाता है। (धारणा ४६)