— कपाल के भीतर (अधिकरण — समासगत); — मन को उसी प्रकार (कर्म + अव्यय); — ध्यान करने वाले को (षष्ठी एकवचन); — शीघ्र ही, थोड़े समय में (अव्यय); — हे प्रभो! (सम्बोधन); — निमीलन आदि से उत्पन्न सिद्धि (कर्ता कारक — समासगत); — चित्-मय (चैतन्य-स्वरूप साधक) की — षष्ठी एकवचन; — उत्पन्न होती है (कर्मवाच्य वर्तमान)
हे प्रभो! कपाल के भीतर (मस्तक के मध्य) मन को वैसे ही (स्थापित करके) ध्यान करने वाले उस चित्-मय (चैतन्य-स्वरूप साधक) को शीघ्र ही निमीलन (नेत्र-निमीलन) आदि से उत्पन्न सिद्धि प्राप्त होती है। (धारणा ४५)