Vijñāna Bhairava Tantra · 1.63

Vijñāna Bhairava Tantra 1.63

1.63
कपालान्तर्मनस्तद्वद्ध्यायतो न चिरात्प्रभो । निमीलनादिजां सिद्धिं चिन्मयस्य प्रजायते ॥६३॥
kapālāntar manas tadvad dhyāyato na cirāt prabho | nimīlanādijāṃ siddhiṃ cinmayasya prajāyate
anuṣṭubh
— कपाल के भीतर (अधिकरण — समासगत) ; — मन को उसी प्रकार (कर्म + अव्यय) ; — ध्यान करने वाले को (षष्ठी एकवचन) ; — शीघ्र ही, थोड़े समय में (अव्यय) ; — हे प्रभो! (सम्बोधन) ; — निमीलन आदि से उत्पन्न सिद्धि (कर्ता कारक — समासगत) ; — चित्-मय (चैतन्य-स्वरूप साधक) की — षष्ठी एकवचन ; — उत्पन्न होती है (कर्मवाच्य वर्तमान)

हे प्रभो! कपाल के भीतर (मस्तक के मध्य) मन को वैसे ही (स्थापित करके) ध्यान करने वाले उस चित्-मय (चैतन्य-स्वरूप साधक) को शीघ्र ही निमीलन (नेत्र-निमीलन) आदि से उत्पन्न सिद्धि प्राप्त होती है। (धारणा ४५)