Vijñāna Bhairava Tantra · 1.62

Vijñāna Bhairava Tantra 1.62

1.62
अमूलं मूलनाडीनां वायुपूर्णां सुषुम्णिकाम् । द्वादशान्ते स्थितां ध्यात्वा अमूलं भैरवं व्रजेत् ॥६२॥
amūlaṃ mūlanāḍīnāṃ vāyupūrṇāṃ suṣumṇikām | dvādaśānte sthitāṃ dhyātvā amūlaṃ bhairavaṃ vrajet
anuṣṭubh
— अमूल, मूल-रहित (कर्म कारक) ; — मूल-नाडियों के (षष्ठी बहुवचन — समासगत) ; — वायु से पूर्ण (समासगत विशेषण) ; — सुषुम्ना का (कर्म कारक स्त्रीलिङ्ग) ; — द्वादशान्त में स्थित (समासगत विशेषण) ; — ध्यान करके (क्त्वान्त) ; — अमूल (परम) भैरव को प्राप्त होता है — कर्म + वर्तमान काल

मूल-नाडियों के मूल (आधार)-रहित मूल, वायु से पूर्ण, द्वादशान्त में स्थित सुषुम्ना का ध्यान करके (साधक) अमूल (मूल-रहित, परम) भैरव को प्राप्त होता है। (धारणा ४४)