Vijñāna Bhairava Tantra · 1.61

Vijñāna Bhairava Tantra 1.61

1.61
यथा तथोपदेशेन क्रियते मरुतां लयः । तथा तथा मनो ज्ञेयं तदवस्थापदं व्रजेत् ॥६१॥
yathā tathopadeśena kriyate marutāṃ layaḥ | tathā tathā mano jñeyaṃ tadavasthāpadaṃ vrajet
anuṣṭubh
— जिस-जिस प्रकार से (अव्यय-युग्म) ; — उपदेश के द्वारा (करण कारक) ; — किया जाता है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — मरुतों (प्राण-वायुओं) का लय (कर्ता कारक — समासगत) ; — उसी-उसी प्रकार (अव्यय-युग्म) ; — मन को जानना चाहिए (कर्म + विधि लिङ् + विशेषण) ; — उस अवस्था के पद को प्राप्त होता है — कर्म + वर्तमान काल — समासगत

जिस-जिस प्रकार के उपदेश से मरुत् (प्राण-वायुओं) का लय किया जाता है, उसी-उसी प्रकार मन को (लय-योग्य) जानना चाहिए; (तब साधक) उसी अवस्था के पद को प्राप्त होता है। (धारणा ४३)