Vijñāna Bhairava Tantra · 1.60

Vijñāna Bhairava Tantra 1.60

1.60
निराधारं संशयेन वर्जितं ख्यातिवर्जितम् । ब्रह्म तत्परमं प्रोक्तं भावयेत्तन्मयो भवेत् ॥६०॥
nirādhāraṃ saṃśayena varjitaṃ khyātivarjitam | brahma tat paramaṃ proktaṃ bhāvayet tanmayo bhavet
anuṣṭubh
— निराधार (कर्म कारक नपुंसक) ; — संशय से रहित (विशेषण) ; — ख्याति (द्वैत-संज्ञान) से रहित (समासगत विशेषण) ; — वह परम ब्रह्म (कर्म कारक) ; — कहा गया है (कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — भावना करे (विधि लिङ्) ; — तन्मय, तद्रूप हो जाता है — कर्ता + विधि लिङ्

निराधार, संशय-रहित, ख्याति (नाम-निर्देश/द्वैत-संज्ञान) रहित — वह परम ब्रह्म कहा गया है; उसकी भावना करे, (तब) तन्मय (तद्रूप) हो जाता है। (धारणा ४२)